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समाजवाद के जनक भगवान श्री अग्रसेन

 

हमारे देश में समय-समय पर अनेक विभूतियों ने जन्म लिया। उन्होंने तत्कालीन समय में प्रचलित कुरीतियों और कमजोरियों को मिटा हम में फिर से आत्मविश्वास का संचार किया और प्रगति के पथ की ओर प्रेरित किया। युगपुरुष भगवान अग्रसेन जी ऐसी ही महान विभूति थे। अपने उदात्त गुणों के कारण वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। भगवान अग्रसेन अग्रवाल वैश्य समाज की महान विभूति ही नहीं, एक युग प्रवर्तक और क्रांतिदृष्टा पुरुष थे। उनका जन्म आज से लगभग ५१२५ वर्ष पूर्व महाभारत युग की अंतिम वेला में हुआ। यह वह समय था जब सत्ता मद में लिप्त राजा एक-दूसरे के राज्य को हड़पने में लगे थे और दुराचार बढ़ रहे थे, चारों ओर अशांति का बोलबाला था। एक-एक इंच जमीन के लिए भाई-भाई से संघर्षरत था। खून की नदियां खौल रही थीं। ऐसे में भगवान अग्रसेन का जन्म प्रताप नगर के राजा वल्लभ के यहां हुआ।

 

समरसभगवान अग्रसेन अत्यंत यशस्वी थे। उन्होंने अनुभव किया कि शक्ति एवं संगठन के अभाव में वीरता निरर्थक है। इसलिए उन्होंने अपने राज्य के १८ कुलों का संगठित कर एक नई जाति का निर्माण किया, जो बाद में अग्रवाल कहलाई। उन्होंने वैश्य होते हुए भी एक नए अग्रोहा गणराज्य की स्थापना की, ताकि वैश्य समुदाय के लोग उद्योग एवं व्यापार से राष्ट्र रक्षा के कार्यों में भी हाथ बंटा सके। उनकी कुशल संगठन क्षमता का ही परिणाम था कि ५ हजार वर्ष व्यतीत हो जाने पर आज भी अग्रवाल जाति उद्योग, व्यवसाय, धर्मपालन के साथ-साथ राष्ट्र रक्षा के कार्य में भी अग्रणी है और इस समाज के वीरों ने स्वदेश प्रेम के उच्चकोटि के आदर्श प्रस्तुत किए हैं।

 

भगवान अग्रसेन एक कुशल एवं जनप्रिय शासक थे। उन्होंने राजतंत्र होते हुए भी अपने राज्य को १८ कुलों में विभक्त कर उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहायता से राजकाज चला कर राजतंत्र में भी लोकतंत्री शासन की नींव रखी। वे वास्तव में लोकतंत्र एवं पंचायती शासन के प्रणेता थे। भगवान अग्रसेन ने अपने राज्य में यह व्यवस्था प्रारम्भ की थी कि जो भी परिवार उनके राज्य में बसने आता था, अग्रोहा निवासी उसे एक रुपया और एक र्इंट भेंट करते। इस प्रकार उनके राज्य में बसने वाले प्रत्येक परिवार को एक लाख रुपया और एक लाख र्इंटे प्राप्त हो जातीं। एक लाख रुपए से वह व्यक्ति अपना व्यवसाय चला लेता और एक लाख र्इंटों से अपना मकान बना लेता। इस प्रकार से उन्होंने अपनी सूझबूझ से एक ऐसे सुखी-सम्पन्न राज्य की नींव रखी, जहां न कोई गरीब, न बेरोजगार। न कोई छोटा था, न कोई बड़ा। सब समान थे और उनके समाज में पारस्परिक प्रेम, सहयोग, सहिष्णुता, भाईचारे, त्याग आदि आदर्शों के कारण सुख-सरिता प्रवाहित होती थी। सब-एक-दूसरे के लिए जीते थे। शोषण का कहीं नाम न था। इस प्रकार वे एक ऐसे आदर्श राज्य के प्रणेता थे, जिसकी तुलना विश्व इतिहास में अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देती और आने वाली पीढ़ियां भी इस प्रकार के सुराज्य को जन्म दे सवेंâगी। इस प्रकार की कल्पना ही कठिन लगती है। उनका राज्य वास्तव में लोक कल्याणकारी राज्य था, जहां सुख शांति सच्चे अर्थों में विराजती और समृद्धि पानी भरती थी। भगवान अग्रसेन मां लक्ष्मी के पक्के भक्त थे और लक्ष्मी को अपनी कुलदेवी मान कर आराधना करते थे। वे यज्ञों में पशु बलि एवं हिंसा के कट्टर विरोधी थे। पुण्य जीवन के भव्य मंदिर की नींव कहें- अहिंसा। भगवान अग्रसेन अहिंसा के पुजारी थे। उनके मन में प्राणी मात्र के प्रति दया व ममता की भावना विद्यमान थी। इसलिए उन्होंने यज्ञों में पशु बलि पर रोक लगा कर अहिंसा का आदर्श उपस्थित किया। भगवान अग्रसेन धार्मिक एवं न्यायप्रिय शासक थे। उन्होंने अपने राज्य की नींव धर्म एवं नैतिकता के आदर्शों पर रखी। धर्म में उनकी अगाध आस्था थी। धर्म उनके लिए नैतिक अभ्युदय का स्रोत तो था ही, साथ ही राष्ट्र की भावनात्मक एकता एवं जन-जन से जुड़ने का माध्यम भी था। इसलिए उन्होंने अपने राज्यकाल में १८ यज्ञों का आयोजन किया। इन यज्ञों में सम्पूर्ण प्रजा भाग लेती, जिससे उनमें सदवृत्तियों का संचार होता। राज्य चोरी, कलह एवं नाना प्रकार की विपदाओं से बचा रहता तथा राजा स्वयं मानव मात्र के कल्याण की कामना करता। यज्ञों में पवित्र द्रव्यों की आहुति दी जाती, जिससे चारों ओर का वातावरण शुद्ध होता। पेड़-पौधेतथा वनस्पतियां भी वातावरण को शुद्ध रखने में मदद देते। वास्तव में उनका राज्य रामराज्य का साकार रूप था और वे विश्व की महान विभूति थे।