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जय श्री अग्रसेन

विधाता ने नर और नारी दोनों को इस सृष्टि में एक-दूसरे के पूरक के रूप में अवतरित किया किन्तु भ्रांतिवश हमारे समाज ने नारी को हेय और कमजोर मान लिया। इसकी चरमावस्था हमें साम्राज्यवाद के उस दौर में देखने को मिलती है जहां भोगवादी संस्कृति के रहते नारी को केवल उपभोग की वस्तु माना जाता था। बहुपत्नी विवाह के नाम पर उसका शोषण आम घटना थी। ऐसे में महामानव श्री अग्रसेन नारी गरिमा के उन्नायक बन कर अवतरित हुए जिन्होंने नारी के सामाजिक महत्व को संबल प्रदान किया। यूं तो महाराजा अग्रसेन का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही प्रेरणा का प्रकाश पुंज रहा है किन्तु नारी गरिमा को लेकर उनके जैसा क्रांतिकारी योगदान अन्यत्र नहीं मिलता।

भगवान अग्रसेन का विवाह नागराज महीधर की कन्या माधवी से तय हुआ तब तक अग्रसेन महाभारत के युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन कर चुके थे साथ ही उनके आदर्श व्यक्तित्व की ख्याति दूर-दूर तक पहुंच चुकी थी। बहुपत्नी विवाह का चलन आम था। नागराज अग्रसेन सा दामाद पाकर स्वयं को धन्य समझ रहे थे। उन्होंने सोचा क्यों न अपनी अन्य कन्याओं का विवाह भी अग्रसेन से ही कर दिया जाए। इस पर महाराज अग्रसेन ने इनकार करते हुए बहुपत्नी संस्कृति पर कटाक्ष करते हुए कहा-

‘‘कथनु में मनिस्विन्यः
पाणिमन्यः माधवी वरीयेत् ।
गहीत्वा नागदुहितरेण
लोके चरेयं धर्ममुत्तमम् ।।’’

अर्थात हे नागराज मैं मन को वश में रखने वाला मनस्वी पुरुष हूं। माधवी को वरण करने के पश्चात किसी अन्य के साथ पाणिग्रहण नहीं करूंगा पत्नी की ये बहनें मेरी भी धर्म की बहनें हैं। कृपया मुझे अधर्म में न धकेलें, मेरी दृष्टि में बहु पत्नी विवाह अधर्म है यह न केवल नारी जाति के प्रति अन्याय है बल्कि लोक और लोकहित दोनों के विरुद्ध है। पत्नी-पति का आधा अंग है वह धर्म सहित प्रजा, शरीर, लोक जीवन, धन, स्वर्ग, ऋषि तथा पितरों की रक्षा करती है। माधवी मेरी पत्नी है, पत्नी के लिए सौत का होना दुखों का कारण तो है ही यह पुरुषों के लिए भी सदैव क्लेश को जन्म देता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है। नारी का त्याग प्रतिदान की कमान से रहित है। शुद्ध सात्विक अनुदान उसका मूल स्वभाव है। वह कन्या के रूप में देवी, विवाह के समय लक्ष्मी स्वरूपा व श्री के समान पूज्यनीय है। सृजन और समर्पण की देवी का हर सम्बन्ध महान है तथा उसका हर रूप वरेण्य है। इसके साथ ही उन्होंने अपने राज्य में केवल उन्हीं लोगों को स्थान दिया जो एक पत्नी का व्रत का पालन करते हैं और राज्य की संरक्षिका महालक्ष्मी के आराधक हों।

आज पुनः हमारा समाज भोगवादी संस्कृति की चपेट में है। टीवी संस्कृति कहें या पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव विवाहेत्तर सम्बन्धों में निरंतर वृद्धि होती जा रही है जिससे जाने-अनजाने हमारी संस्कृति तो आहत हुई ही है साथ ही परिवार की नींव भी कमजोर हो रही है। आवश्यकता है हम अपने आदर्श पुरुष महामानव श्री अग्रसेन भगवान के व्यक्तित्व को आत्मसात करें। जब तक हम अपने परिवार व समाज में नारी को यथोचित स्थान नहीं देंगे तब तक सुख-शांति को अपने से कोसों दूर करते रहेंगे और सुख शांति से विहीन घर और समाज में महालक्ष्मी का निवास भी असम्भव है और जब तक हमारा समाज नारी सम्मान और महालक्ष्मी के आशीर्वाद से दूर है तब तक हम अग्रवंश के सच्चे अनुयायी वैâसे हो सकते हैं?